
दिल्ली। भारत ने विज्ञान आधारित नीतियों और मजबूत संस्थागत सहयोग के माध्यम से बाघ संरक्षण के क्षेत्र में विश्व भर में सबसे आगे अपनी पहचान बनाई है। अब देश विश्व के लगभग 70% जंगली बाघों का घर है। तकनीक-आधारित निगरानी, प्रभावी शासन और सामुदायिक भागीदारी ने संरक्षण को और मजबूत किया है। भारत बाघों और उनके प्राकृतिक आवासों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए वैश्विक सहयोग को भी बढ़ावा दे रहा है।

फलते-फूलते बाघ, मज़बूत पारिस्थितिकी तंत्र
हर साल 29 जुलाई को मनाया जाने वाला ‘अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस’ बाघ संरक्षण के वैश्विक महत्व को उजागर करता है। भारत के लिए, यह विज्ञान-आधारित संरक्षण और सतत विकास के प्रति सरकार की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दोहराता है। यह दिन भारत की उल्लेखनीय संरक्षण उपलब्धियों को भी प्रदर्शित करता है। आज, भारत में दुनिया की सबसे बड़ी जंगली बाघों की आबादी है, जो वैश्विक स्तर पर सभी जंगली बाघों का लगभग 70% है। यह सफलता दशकों के निरंतर नीतिगत समर्थन, वैज्ञानिक प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी को दर्शाती है, जिससे भारत बाघ संरक्षण में एक वैश्विक अग्रणी के रूप में स्थापित हुआ है।
यह उपलब्धि बाघ के साथ भारत के गहरे सांस्कृतिक और पारिस्थितिक जुड़ाव पर आधारित है। सदियों से, पुराने सिक्कों, शाही मुहरों और मंदिरों की नक्काशी में बाघ को ताकत और प्रभुत्व के प्रतीक के रूप में दिखाया गया है। इस लंबे समय से चली आ रही विरासत को पहचानते हुए, सरकार ने 1972 में रॉयल बंगाल टाइगर को राष्ट्रीय पशु घोषित किया। आज भी, बाघ भारत की समृद्ध जैव-विविधता, पारिस्थितिक संपदा और विविध इलाकों में फैली साझा प्राकृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करता है।
बाघ का सांस्कृतिक महत्व तो है ही, साथ ही यह पारिस्थितिकी तंत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शीर्ष शिकारी और ‘अंब्रेला प्रजाति’ (संरक्षण छत्र) होने के नाते, यह स्वस्थ वन पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में सहायक होता है। बाघों के प्राकृतिक आवासों का संरक्षण वनों, नदियों और अनगिनत अन्य प्रजातियों की रक्षा करता है। ये वन जल नियंत्रण, मृदा संरक्षण करते हैं, परागण में सहयोग प्रदान करते हैं और स्थानीय जलवायु को संतुलित रखते हैं। ये आपदा जोखिम को भी कम करते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करते हैं जो ग्रामीण आजीविका और शहरी अर्थव्यवस्थाओं को आधार देती हैं। बाघों और उनके आवासों की रक्षा करके, सरकार जैव विविधता संरक्षण को मजबूत कर रही है, पारिस्थितिक सुरक्षा को बढ़ा रही है और सतत विकास के माध्यम से ‘विकसित भारत’ के संकल्प को आगे बढ़ा रही है।
क्या आप जानते हैं? अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस की शुरुआत नवंबर 2010 में आयोजित ‘सेंट पीटर्सबर्ग टाइगर समिट’ से हुई थी। भारत सहित 13 बाघ-रेंज वाले देशों के नेताओं ने 2022 तक दुनिया भर में जंगली बाघों की आबादी को दोगुना करने का महत्वाकांक्षी ‘टीx2’ लक्ष्य अपनाया था। आज, यह संरक्षण की प्रगति की समीक्षा करने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने और जागरूकता बढ़ाने के लिए एक वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है। 2010 में, विश्व स्तर पर केवल लगभग 3,200 जंगली बाघ होने का अनुमान था। 2022 तक, बेहतर संरक्षण और वैज्ञानिक निगरानी से यह अनुमान बढ़कर लगभग 4,500 हो गया, जिसमें 3,700 से 5,600 बाघों की संभावित सीमा शामिल है। हालिया वैश्विक अनुमानों के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 5,711 जंगली बाघ हैं, जो 2010 के बाद से लगभग 78% की वृद्धि को दर्शाता है।
बाघों की संख्या में वृद्धि: संकट से उबरने तक का सफर
भारत की बाघ संरक्षण की कोशिशें वन्यजीवों की संख्या बढ़ाने के मामले में दुनिया के लिए एक मिसाल बन गई हैं। 2006 के बाद से देश में वैज्ञानिक तरीके से गिनी गई बाघों की संख्या दोगुनी से भी ज़्यादा हो गई है। ‘अखिल भारतीय बाघ अनुमान (2022)’ के अनुसार, भारत में बाघों की संख्या 3,682 है। 2022 के इस अखिल भारतीय बाघ अनुमान में 20 राज्यों को शामिल किया गया और 6.41 लाख किलोमीटर से अधिक का क्षेत्र पैदल तय करके सर्वेक्षण किया गया। यह दुनिया के सबसे बड़े और सबसे व्यापक वन्यजीव सर्वेक्षण में से एक है। बाघों की संख्या में यह शानदार बढ़ोतरी लगातार मिल रहे नीतिगत समर्थन, विज्ञान-आधारित संरक्षण और मज़बूत संस्थागत कामकाज का नतीजा है। लंबे समय तक प्राकृतिक आवास की सुरक्षा, कड़ी निगरानी और तालमेल के साथ काम करने से पूरे भारत में बाघ संरक्षण को और मज़बूती मिल रही है।
बाघ संरक्षण के लिए मजबूत प्रशासनिक ढांचा
भारत की बाघ संरक्षण नीति में लंबे समय की सोच और राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर लगातार संस्थागत सहयोग का मेल है। ‘प्रोजेक्ट टाइगर’, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और बाघ संरक्षण योजनाएं मिलकर बाघों के प्राकृतिक आवास के लिए एक मज़बूत और विज्ञान आधारित प्रशासनिक ढांचा तैयार करते हैं।
प्रोजेक्ट टाइगर
‘प्रोजेक्ट टाइगर’ भारत सरकार की एक प्रमुख केंद्रीय प्रायोजित योजना है। इसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा लागू किया जाता है। इस योजना का मकसद बाघों की आबादी को उनके प्राकृतिक आवासों में सुरक्षित रखना है। यह संरक्षण के प्रयासों के लिए बाघ वाले राज्यों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देता है। इस कार्यक्रम में आवास की सुरक्षा, वैज्ञानिक प्रबंधन और नियमित रूप से ज़मीनी स्तर पर निगरानी को शामिल किया गया है। इस तरीके ने समय के साथ संरक्षण के उपायों को मज़बूत किया है।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की रिपोर्ट (2023) के अनुसार, ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ ने 18 बाघ-रेंज वाले राज्यों में 58 बाघ अभ्यारण्य का एक नेटवर्क स्थापित किया है। ये अभ्यारण्य लगभग 84,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करते हैं, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 2.56% है। आज, ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों की एक आधारशिला बना हुआ है और यह बाघों तथा उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा के प्रति सरकार की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
क्या आप जानते हैं? वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम , (डब्ल्यूपीए), 1972 की धारा 38 V (3) के तहत प्रत्येक राज्य सरकार के लिए प्रत्येक बाघ अभ्यारण्य के लिए एक ‘बाघ संरक्षण योजना’ तैयार करना अनिवार्य है। ऐसी योजनाओं को बाघ अभ्यारण्य की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए और बाघों, उनके साथ शिकार करने वाले अन्य जानवरों तथा उनका शिकार बनने वाले जानवरों की आबादी को बनाए रखने के लिए उपयुक्त आवास सुविधाएं प्रदान करनी चाहिए।
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ और उससे जुड़ी संरक्षण पहलों के कार्यान्वयन की निगरानी करता है। एनटीसीए बाघ-रेंज वाले राज्यों को वैज्ञानिक, तकनीकी और वित्तीय मार्गदर्शन प्रदान करता है। यह ‘बाघ संरक्षण योजनाओं’ को मंजूरी देता है और अभ्यारण्य प्रबंधन के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) जारी करता है। यह प्राधिकरण आवधिक आकलनों के माध्यम से बाघ अभ्यारण्य के प्रबंधन की निगरानी भी करता है। इसका विज्ञान आधारित दृष्टिकोण आवास संरक्षण में सुधार करता है, संरक्षण के परिणामों को बेहतर बनाता है और पूरे भारत में जंगली बाघों के लंबे समय तक बचे रहने में मदद करता है।
क्या आप जानते हैं? एनटीसीए की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री करते हैं। इसमें संसद सदस्य, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और विशेषज्ञ भी शामिल होते हैं। यह प्राधिकरण बाघ संरक्षण का मार्गदर्शन करता है, बाघ अभ्यारण्य की देखरेख करता है और पूरे देश में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करता है।
टाइगर टास्क फोर्स
भारत सरकार ने संरक्षण नीतियों का पुनपरीक्षण करने और सुधारों की सिफारिश करने के लिए ‘टाइगर टास्क फोर्स’ का गठन किया था। टाइगर टास्क फोर्स ने भारत के बाघ संरक्षण ढांचे की समीक्षा की और महत्वपूर्ण नीतिगत सुधारों की सिफारिश की। इससे प्रशासनिक विशेषज्ञ, पारिस्थितिकीविद और सामुदायिक प्रतिनिधि एक मंच पर आये। टास्क फोर्स ने पारदर्शिता, सामुदायिक भागीदारी और ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के लिए मजबूत संस्थागत सहयोग पर जोर दिया। इसकी सिफारिशों ने एक अधिक सुदृढ़ संरक्षण ढांचे को आकार दिया। इनके परिणामस्वरूप 2006 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। इन संशोधनों ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी) को वैधानिक निकायों के रूप में स्थापित किया।
भारत का बाघ संरक्षण ढांचा संस्थानों और सहकारी संघवाद पर आधारित एक मजबूत शासन मॉडल को दर्शाता है। यह एकीकृत दृष्टिकोण भारत की जैव विविधता को आगे बढ़ाते हुए बाघों के भविष्य को सुरक्षित करने में मदद कर रहा है।
क्या आप जानते हैं? भारत के बाघ अभ्यारण्य ‘लैंडस्केप-आधारित संरक्षण दृष्टिकोण का पालन करते हैं। प्रत्येक अभ्यारण्य में एक ‘कोर क्षेत्र’ (जिसे क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट या संकटग्रस्त बाघ आवास भी कहा जाता है) और एक ‘बफर क्षेत्र’ शामिल होता है। कोर क्षेत्रों को सर्वोच्च स्तर की सुरक्षा प्राप्त होती है। बफर क्षेत्र संरक्षण और सतत आजीविका के बीच संतुलन बनाए रखते हैं। इसके अलावा, वन्यजीव गलियारे बाघ अभ्यारण्य को आपस में जोड़ते हैं, जिससे बाघों की सुरक्षित आवाजाही संभव होती है और पूरे क्षेत्र में उनकी स्वस्थ आबादी बनी रहती है।
भारत में बाघों की निगरानी और मूल्यांकन
भारत ने बाघों की आबादी की निगरानी और मूल्यांकन के लिए एक मजबूत, विज्ञान आधारित प्रणाली विकसित की है। यह दृष्टिकोण मैदानी सर्वेक्षणों, कैमरा ट्रैप, डिजिटल तकनीकों और वैज्ञानिक विश्लेषण को जोड़ता है। यह बाघों की आबादी, शिकार की प्रजातियों और आवास की गुणवत्ता पर विश्वसनीय डेटा उत्पन्न करता है। यह जानकारी साक्ष्य-आधारित संरक्षण नियोजन और अनुकूलनीय प्रबंधन का मार्गदर्शन करती है। निरंतर निगरानी आवास संरक्षण को मजबूत करती है और संपूर्ण बाघ क्षेत्रों में सुविचारित प्रबंधकीय निर्णयों को सक्षम बनाती है।
अखिल भारतीय बाघ अनुमान (एआईटीइ): दुनिया का सबसे बड़ा जैव विविधता सर्वेक्षण
एआईटीइ दुनिया का सबसे बड़ा जैव विविधता सर्वेक्षण है। हर चार साल में आयोजित होने वाले इस सर्वेक्षण का नेतृत्व एनटीसीए, भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से करता है। यह सभी बाघ-समृद्ध राज्यों में बाघों की आबादी, सह-शिकारियों, बाघ का शिकार होने वाली प्रजातियों और आवास की गुणवत्ता का आकलन करता है। 2022 के मूल्यांकन में भारत का खुरदार जानवरों (अंगुलेट्स) का पहला देशव्यापी सर्वेक्षण भी शामिल था। इस अभ्यास ने सक्षम बाघों की आबादी को बनाए रखने के लिए स्वस्थ शिकार आबादी के महत्व पर प्रकाश डाला।
क्या आप जानते हैं? अखिल भारतीय बाघ अनुमान को दुनिया के सबसे बड़े जैव विविधता सर्वेक्षण के रूप में मान्यता प्राप्त है। एनटीसीए का ‘कैमरा ट्रैप सर्वेक्षण’ दुनिया के सबसे बड़े कैमरा ट्रैप वन्यजीव सर्वेक्षण के रूप में ‘गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड’ भी दर्ज कर चुका है। उन्नत प्रौद्योगिकियों और वैज्ञानिक निगरानी का यह संयोजन भारत के बाघ अनुमान को दुनिया में सबसे सटीक और कठोर सर्वेक्षणों में से एक बनाता है।
प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी
भारत ने बाघों की निगरानी के हर चरण में उन्नत डिजिटल तकनीकों को एकीकृत किया है। बाघों की निगरानी प्रणाली-गहन संरक्षण और पारिस्थितिक स्थिति (एम-स्ट्राइ







